संघर्ष, सोशल इंजीनियरिंग और सियासी रणनीति ने बनाया बहेड़ी की राजनीति का बड़ा चेहरा
संवाददाता विमल सिंह बरेली BREAKING RV NEWS
बरेली। बहेड़ी विधानसभा की राजनीति में पूर्व मंत्री और वर्तमान सपा विधायक अताउर रहमान का नाम एक ऐसे नेता के रूप में लिया जाता है, जिन्होंने लगातार बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई। उनके समर्थक उन्हें बहेड़ी की राजनीति का ‘चाणक्य’ कहते हैं, जबकि राजनीतिक विश्लेषक उनकी चुनावी रणनीति और सामाजिक समीकरण साधने की क्षमता को उनकी सबसे बड़ी ताकत मानते हैं।
अताउर रहमान को राजनीति विरासत में मिली। उनके पिता मरहूम शफीक अहमद कांग्रेस के जिला उपाध्यक्ष रहे और पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के करीबी माने जाते थे। अताउर रहमान ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त की और छात्र जीवन में वह एक अच्छे वॉलीबॉल खिलाड़ी भी रहे।
वर्ष 2002 में मिली राजनीतिक पहचान
अताउर रहमान का राजनीतिक सफर वर्ष 1996 से शुरू हुआ, लेकिन उन्हें वास्तविक पहचान वर्ष 2002 के विधानसभा चुनाव में मिली। उस समय समाजवादी पार्टी ने दो बार के विधायक मरहूम मंजूर अहमद को उम्मीदवार बनाया, जबकि बसपा ने युवा चेहरे के रूप में अताउर रहमान पर भरोसा जताया। अपने पहले बड़े चुनाव में वह कड़े मुकाबले में हार गए, लेकिन बहेड़ी की राजनीति में एक मजबूत युवा नेता के रूप में उभरकर सामने आए।
इसी बीच 6 जून 2002 को विधायक मंजूर अहमद की हत्या के बाद हुए उपचुनाव में बसपा ने एक बार फिर अताउर रहमान को मैदान में उतारा। उन्होंने सपा प्रत्याशी मुमताज जहां को हराकर पहली बार विधानसभा पहुंचने में सफलता हासिल की और बहेड़ी सीट पर बसपा का परचम लहराया।
दल बदला, लेकिन जनाधार नहीं
बाद में उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा बदलाव आया और अताउर रहमान बसपा छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए। वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, लेकिन इसी हार के बाद उन्होंने बहेड़ी की सामाजिक और जातीय संरचना को नए सिरे से समझते हुए अपनी राजनीतिक रणनीति तैयार की।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अताउर रहमान ने मुस्लिम मतदाताओं के साथ-साथ मौर्य, कुर्मी, कश्यप, जाट, सिख, प्रजापति, पिछड़े वर्ग और दलित समुदायों के बीच भी अपनी पकड़ मजबूत करने का प्रयास किया। इसी सामाजिक समीकरण और व्यापक जनसंपर्क को उनके समर्थक उनकी ‘सोशल इंजीनियरिंग’ बताते हैं।
18 वोट से जीत और बनी ‘चाणक्य’ की छवि
वर्ष 2012 का चुनाव बहेड़ी की राजनीति के सबसे रोमांचक मुकाबलों में से एक माना जाता है। इस चुनाव में अताउर रहमान ने भाजपा के छत्रपाल सिंह गंगवार को महज 18 मतों से हराकर जीत दर्ज की। इस बेहद करीबी जीत के बाद उनके समर्थकों के बीच उनकी रणनीतिक क्षमता की चर्चा और बढ़ गई।
2017 की हार के बाद फिर वापसी
वर्ष 2017 में सपा-कांग्रेस गठबंधन के कारण बहेड़ी सीट कांग्रेस के खाते में चली गई और सपा ने अपना उम्मीदवार नहीं उतारा। चुनाव में भाजपा ने बड़ी जीत दर्ज की। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि इस हार के बाद समाजवादी पार्टी के सामने बहेड़ी में संगठन को दोबारा खड़ा करना एक बड़ी चुनौती थी।
2022 में फिर साबित की राजनीतिक पकड़
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने एक बार फिर अताउर रहमान पर भरोसा जताया और उन्होंने चुनाव जीतकर विधानसभा में वापसी की। वर्तमान में वह बहेड़ी से सपा विधायक हैं और पार्टी ने उन्हें प्रदेश महासचिव जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी सौंपी है, जिसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनके राजनीतिक प्रभाव के रूप में देखा गया।
2027 को लेकर बढ़ी राजनीतिक चर्चा
बहेड़ी की राजनीति में यह चर्चा लगातार बनी हुई है कि आने वाले विधानसभा चुनावों में भी अताउर रहमान एक महत्वपूर्ण राजनीतिक चेहरा बने रहेंगे। हालांकि भविष्य के चुनाव परिणामों को लेकर कोई निश्चित दावा नहीं किया जा सकता, लेकिन यह तय है कि बहेड़ी की राजनीति में उनकी रणनीति, संगठन क्षमता और सामाजिक समीकरणों को साधने की कला उन्हें क्षेत्र के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल करती है।
Post a Comment